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भ्रष्टाचार पर पर्दा या जाँच का नाटक? साऊँघाट ब्लॉक में ‘मैच फिक्सिंग’ का खेल।

साऊँघाट में न्याय का जनाजा: साहब की जाँच, मातहत के हाथ!

अजीत मिश्रा (खोजी)

साऊँघाट: जहाँ ‘अपनों’ की जाँच ‘अपने’ ही करते हैं—भ्रष्टाचार को ढकने का गंदा खेल!

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • जब रक्षक ही भक्षक के ‘मददगार’ बन जाएँ: साऊँघाट में जाँच के नाम पर सिर्फ लीपा-पोती। वाह रे सिस्टम! चोर को ही सौंप दी चोरी की जाँच की कमान।
  • साऊँघाट का अनोखा फॉर्मूला: अपने ही विभाग की जाँच, अपने ही ‘करीबियों’ के पास।
  • जाँच नहीं, ‘क्लीन चिट’ की एडवांस बुकिंग: तरेता पंचायत का सच दबाने की साजिश।
  • बस्ती प्रशासन से सवाल: क्या अधीनस्थ अधिकारी कर पाएगा अपने ‘बोस’ की निष्पक्ष जाँच?
  • शिकायतकर्ता को सूचना नहीं, साक्ष्यों से छेड़छाड़ की तैयारी? आखिर किसका डर है साऊँघाट ब्लॉक को?
  • क्या ‘जाँच’ शब्द का गला घोंट रहा है साऊँघाट का प्रशासनिक तंत्र?

बस्ती। जनपद के साऊँघाट विकास खंड में इन दिनों प्रशासनिक नैतिकता का जनाजा निकल रहा है। विकास कार्यों में धांधली की शिकायतों पर जिस तरह की “जाँच” का नाटक रचा जा रहा है, वह अब केवल अनियमितता का मामला नहीं रहा, बल्कि तंत्र के खुले भ्रष्टाचार और बेशर्मी का जीवंत प्रमाण बन चुका है। प्रशासन ने यहाँ न्याय का नया सिद्धांत गढ़ लिया है—”जिस पर आरोप, उसी का मातहत जाँच अधिकारी!”

जाँच या क्लीन चिट की एडवांस बुकिंग?

नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए साऊँघाट में खंड विकास अधिकारी (BDO) के विरुद्ध शिकायतों की जाँच का जिम्मा उनके ही अधीन कार्यरत एडीओ (पंचायत) को सौंप दिया गया। यह स्थिति न केवल हास्यास्पद है, बल्कि प्रशासनिक शुचिता पर तमाचा भी है। जब जाँचकर्ता ही अपने बॉस की कुर्सी के नीचे काम करता हो, तो रिपोर्ट की निष्पक्षता का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। यह पूरी प्रक्रिया एक सुनियोजित ‘मैच फिक्सिंग’ की ओर इशारा करती है, जहाँ भ्रष्टाचार को दफनाने के लिए पहले ही गड्ढा खोद दिया गया है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे “चोर को ही तिजोरी की सुरक्षा का जिम्मा सौंप देना।”

तरेता ग्राम पंचायत: सच मिटाने की कवायद

तरेता ग्राम पंचायत का प्रकरण प्रशासन की हड़बड़ी और डर को साफ उजागर करता है। जैसे ही शिकायत शासन की चौखट तक पहुँची, ब्लॉक मुख्यालय में हड़कंप मच गया। जिला स्तरीय टीम के पहुँचने से पहले ही ब्लॉक के कर्मचारियों का आनन-फानन में मौके पर पहुँचना इस बात का पुख्ता संकेत है कि साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ और सच को दबाने की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी थी।

“सबसे बड़ा सवाल यह है कि शिकायतकर्ता को जाँच की सूचना क्यों नहीं दी गई? क्या यह सिर्फ एक ‘भूल’ थी या जाँच को एकतरफा बनाकर आरोपितों को बचाने की सोची-समझी रणनीति?”

खत्म होता जन-विश्वास

ग्रामीणों के बीच फैला आक्रोश और अविश्वास चीख-चीख कर कह रहा है कि अब ऐसी कागजी और औपचारिक जाँचों से जनता का भरोसा उठ चुका है। जाँच के नाम पर हो रही इस ‘आंतरिक सांठगांठ’ ने सरकारी तंत्र को मजाक बना दिया है। यदि प्रशासन वाकई भ्रष्टाचार मुक्त शासन का दम भरता है, तो उसे इस ‘लीपा-पोती’ वाली व्यवस्था को तुरंत ध्वस्त करना होगा।

अर्थ खोता शब्द ‘जाँच’

साऊँघाट का यह मामला यह तय करेगा कि जिला प्रशासन भ्रष्टाचार के खिलाफ है या उसके संरक्षण में। अगर मातहत ही साहब के गुनाहों को सफेद करने में लगे रहेंगे, तो ‘जाँच’ शब्द शब्दकोश से अपना अर्थ खो देगा और ‘भ्रष्टाचार’ इस व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन जाएगा। अब देखना यह है कि उच्चाधिकारी इस ‘क्लीन चिट तंत्र’ पर कब नकेल कसते हैं।

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